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34 लापता लड़कियों को ढूंढ रही 29 थानों की पुलिस

by Shrinews24
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34 लापता लड़कियों को ढूंढ रही 29 थानों की पुलिस

राहुल कुमार गुप्ता
श्याम जी सोनी
गोरखपुर

गोरखपुर जिले में अन्य घटनाओं की तरह घर से बहला फुसलाकर भगा ले जाने वाली लड़कियों को भी ढूढ़ने में गोरखपुर पुलिस पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है। यही वजह है कि फिलहाल जिले से लापता 34 लापता लड़कियों को यहां 29 थानों की पुलिस भी नहीं ढूंढ सकी। हैरानी वाली बात तो यह है कि इन लड़कियों को ढूढंने के लिए पुलिस इनके गरीब परिजनों से ही उम्मीद लगाए बैठी है कि वे पुलिस को साधन और खर्च उपलब्ध कराएं तो फिर बरामदगी के लिए टीम बाहर भेजी जाए।
8 महीने से नहीं मिला टीए व डीए
विवेचाना कर रहे दरोगाओं के सामने अब प्रदेश से बाहर जाकर बरामदगी करने के लिए फंड की कमी है। विभाग की ओर से उन्हें 8 महीनों से अधिक का अब तक टीए और डीए तक नहीं मिला है। ऐसे में विवेचना के लिए या तो वे खुद की सैलरी से रुपए खर्च करें या फिर पीड़ित परिवार से मदद लें। यही वजह है कि अधिकांश मामलों में पुलिस के सामने बजट का संकट खड़ा हो गया है।
आलम यह है कि ऐसे ही गोरखपुर एक मामले में पीड़ित परिवार की शिकायत पर बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देनी पड़ी। कोर्ट की दलख के बाद गोरखपुर पुलिस ने अपहरण का केस दिल्ली के मालवीय नगर पुलिस को ट्रांसफर किया। लेकिन पीड़ित परिवार के तमाम मिन्नतों के बाद भी पुलिस उस परिवार की अपहरण की हुई बेटी को नहीं ढूंढ सकी।
8 महीने में गायब हुई 173 लड़कियां
दरअसल, बीते वर्ष 1 जनवरी 2020 से 31 दिसंबर 2020 तक भी पूरे वर्ष में अपहरण की गई 30 लड़कियों का पुलिस आज तक पता नहीं लगा सकी। इसके साथ ही 1 जनवरी 2021 ये 31 अगस्त 2021 तक इस 8 महीने के दरमयान जिले कुल 173 लड़कियों के अपहरण का पुलिस ने केस दर्ज किया। इस तरह जिले से कुल लापता 203 लड़कियों में पुलिस ने 173 को सकुशल बरामद करने का दावा किया, लेकिन शेष 34 लड़कियों को पुलिस अब तक नहीं ढूंढ सकी।
प्रदेश के बाहर जाना होता मुश्किल
पुलिस के मुताबिक इनमें से अधिकांश लड़कियों का लोकेशन उत्तर प्रदेश से बाहर मिला है। यह लड़कियां कोलकाता, मुंबई और दिल्ली में हैं। ऐसे ही अपहरण के मामलों के विवेचकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जिसकी वजह से उन्होंने ढूंढ निकालना पुलिस के लिए मुश्किल होता है। वहीं, जिन मामलों में पीड़ित परिवार पुलिस को साधन आदि उपलब्ध करा देता, उन मामलों में पुलिस थोड़ी रूचि भी दिखाती, लेकिन जिन मामलों में सबकुछ पुलिस पर ही निर्भर होता, उन मामलों में पुलिस हवा में ही तीर चलाती है। क्योंकि पुलिस के पास विवेचना के नाम पर कोई बजट नहीं है। टीए और डीए भरने से पहले भी दरोगाओं को 10 फीसद कमीशन देना पड़ता है। बावजूद इसके उनका भुगतान कब होगा, यह किसी को नहीं पता होता।
यह आती है समस्या
नाम न छापने की शर्त पर एक दरोगा ने बताया कि विवेचना के लिए पुलिस को कोई फंड नहीं मिलता है। ऐसे में अगर प्रदेश से बाहर जाकर कोई विवेचना करनी है या फिर किसी लड़की की बरामदगी करनी है तो उसके लिए एक दरोगा, दो कांस्टेबल और दो महिला कांस्टेबल की जरूरत पड़ती है। अब ऐसे में यह सभी खर्चे दरोगा को अपनी जेब से ही उठाने पड़ते हैं।
वहीं, कई मामलों में भागने वाले लड़के लड़की मोबाइल भी बंद कर देते हैं। ऐसे में उनका लोकेशन भी ट्रेस नहीं हो पाता। जबकि कई मामलों में परिवार के लोग लड़की को नाबालिग बताकर केस दर्ज कराते हैं, लेकिन बरामदगी के समय लड़की स्वंय के बालिग होने और इच्छा से शादी करने का दावा करती है। ऐसे मामलों में फिर पुलिस कुछ नहीं कर पाती।

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