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भारत की राजनीति में जनगणना का महत्व

by Shrinews24
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भारत की राजनीति में जनगणना का महत्व

भारत की राजनीति में जनगणना का महत्व ।।

लेखिका- सुनीता कुमारी

पूर्णियाँ ,बिहार।

राजनीति में मतगणना और जनगणना दोनों ही भारत की राजनीति में राजनीति तापमान को बढ़ा देते हैं। मतगणना से सत्ता में नई राजनीति शुरू होती है एवं, जनगणना से राजनीतिक पार्टियों को राजनीति रोटी सेकने में आसानी होती है ।जातिगत समीकरण का पता चलने के बाद राजनीति पार्टियों को सत्ता के गलियारे तक पहुंचने में आसानी होती है। हार जीत के दांव-पेंच पर का खेल खेलने में सहूलियत होती है ।यह कहने की जरूरत नहीं कि भारत की राजनीति जातिगत राजनीति बन चुकी है ।जाति और धर्म के समीकरण के आधार पर , राजनीति पार्टी आसानी से सत्ता तक पहुंच जाती हैं ,साथ ही इस कोशिश में लगी रहती हैं कि, जातिगत जनगणना हो ताकि, उनका राजनीतिक सफर और आसान हो जाए। जातिवाद के दम पर वे राजनीतिक करते रहे ,व जेब भरते रहे ।

भारत में जनगणना की शुरुआत 1881 ईस्वी में हुई है। इसके बाद हर 10 साल बाद जनगणना होती आ रही है इस जन्म जनगणना में धर्म और एससी एसटी आधारित जनगणना होती रही है ।जातिगत जनगणना 1931 और 1941 में हुई थी किंतु रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। 1947 के बाद के जनगणना में जातिगत जनगणना नहीं हुई है किंतु इसकी मांग समय-समय पर उठती रही है। इसी क्रम में बिहार के मुख्यमंत्री एवं विपक्ष के सभी नेता एकमत होकर जातिगत जनगणना की मांग लेकर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की,एवं बिहार में जातिगत जनगणना कराने की मांग की। साझा बयान जारी कर जनता को आश्वासन दिया कि,बिहार में जातिगत जनगणना की अनुमति मिल जाएगी ।पक्ष और विपक्ष दोनों एक मत है ।दोनों के हवाले से यह बात सामने आ रही है कि जातिगत जनगणना के बाद जातीय स्तर पर सरकारी सुविधाएं लोगों तक आसानी से पहुंच सकेगी ।परंतु पक्ष और विपक्ष के किसी भी नेता ने यह नहीं कहा कि ,जातिगत जनगणना होने से राजनीतिक पार्टियों को राजनीति करने में आसानी होगी ।जाति बहुल क्षेत्र में उस जाति का कैंडिडेट चुनाव में चुनाव लड़ेंगे, और पहले से जीत सुनिश्चित होगी ।जातिवाद को बढावा मिलेगा ,जातिगत दंगे होगे।समाजिक व्यवस्था की नीव हिल जाएगी।

2011 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 1 अरब 21 करोड़ आबादी है ।जिसमें 79 . 79 फीसदी हिंदू ,14 . 22 फ़ीसदी मुसलमान ।2 . 29 फीसदी ईसाई ,1 .72 सीख ,0.69% और 0 पॉइंट 36 पीस दी जैन है

सभी जानते हैं कि जातिवाद समाज के लिए अच्छा नहीं है ।यह समाज में दो समुदायों के बीच अलगाव पैदा करती हैं ,एवं भारत की एकता ,अखण्डता सम्प्रभुता के लिए भी जातिवाद की राजनीति सही नहीं है ।जब पूरे विश्व का वैश्वीकरण हो रहा है ।आम जनता जातिवाद के फंदे को काटकर बाहर निकलना चाह रही हैं ।तेजी से एक जाति दूसरी जाति को स्वीकार कर रही है ।अंतरजातीय विवाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ,वही देश के नेता गण जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं निश्चय ही निकट भविष्य में जातिगत राजनीति के दुष्परिणाम देखने को मिल सकता हैं ।विवाद का कारण चाहे जो भी रहा हो भुगतना तो आम जनता को ही पड़ता है। इस जातिगत राजनीति का दुष्परिणाम भी आम जनता को ही भुगतना पड़ेगा, और जनता भुगत भी रही है इसके बहुत सारे उदाहरण हमारे देश में मौजूद हैं।जबकि,होना यह चाहिए कि ,भारत को एक समान एवं जाति मुक्त करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए जिससे भारत की एकता अखंडता संप्रभुता बनी रहे। ना की जातिगत राजनीति और आरक्षण के आग को बढ़ावा देना चाहिए।जनता का विकास जातिगत जनगणना से नही बल्कि देश के विकास से होगा।

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