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देश को खतरा: आंतरिक या बाहरी

by Shrinews24
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लेख दुसरा भाग

शीर्षक देश को खतरा: आंतरिक या बाहरी

लेखिकि दीप्ति डांगे, मुम्बई

आंतकवाद हमारे देश के लिये ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए एक विकराल समस्या बन चुकी है। देश कई दशकों से आतंकवाद को झेल रहा है।आतंकवादी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लोगों की निर्मम हत्या करके देश को अस्थिर करना चाहते हैं।आज विश्व इस्लामी आतंकवाद से ग्रस्थ है भारत भी इससे अछूता नही है कई दशकों से देश इस खतरे का सामना कर रहा है।जो पाकिस्तान द्वारा पोषित है।कई आतंकवादी संगंठन जैसे आई एस आई एस (ISIS), अलकायदा,लश्कर-ए-तैयबा,तालिबानी जिनका कार्य धर्म के नाम पर, जाति संप्रदाय के नाम पर देश के लोगो आपस लड़ाना है, उनके बीच मत भेद पैदा करना, अपने धर्म को दुसरे पर थोपना, देश मे अराजकता फैलाना, देश मे आतंकी हमले कर जनता और देश मे डर और भय का माहौल बनाकर देश को अंदर से अस्थिर करना और उनका साथ हमारे देश में कुछ बुद्धिजीवी,पत्रकार,नेता, उद्योगपति, धार्मिक गुरु, संस्थानों के लोग इन आतंकवादियों को आर्थिक और मानव श्रम की मदद करके जिस थाली मे खाते है उसी मे छेद करते है। पाकिस्तान जो आंतकवाद की फैक्ट्री अपने देश और हमारे देश के मुस्लिम युवाओं को हसीन सपनों का लालच देकर उन बच्चों के मानस पटल पर कट्टरपंथी सोच का जाल बुन कर और मानवता को गलत तरीके से पेश करके इनको समाज, समुदाय और राष्ट्र के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है। सच्चाई ये है कि आतंकवाद केवल कुछ लोगो या देश की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए मानवता और दूसरे देशो के विरुद्ध किया गया विद्रोह है।जो आम जनमानस में और सरकार में दहशत पैदा कर उनपर दवाब बनाकर अपने लक्ष्य या उद्देश्य को पूरा करने के लिए होता है।

नक्सलवाद और उग्रवाद देश की अंदरूनी सुरक्षा के लिए आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक हो चुका है। इनकी विचारधारा तालिबानियों की तरह है।ये लोग चीन के चेयरमैन कामरेड माओत्सेतुंग की माओवादी विचाधारा के अनुयायी होते है।इनको चीन और कई इस्लामिक राष्ट्रों और सामाजिक संस्थायों से सहायता मिलती है। ये लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ होते है।और एक ऐसी तानाशाही व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं जिसमें किसी को उफ़ तक करने की आज़ादी न हो।इनके लिए स्कूलों, विद्युत् उत्पादन केन्द्रों,अस्पतालों, पुलों, सडकों को बम से उड़ा देना,गरीबों और मासूमों की हत्या तालिबानी शैली में करना आम बात है।दुकानदारों, मिल मालिकों, पूंजीपतियों से हफ्ता वसूल करते हैं।ये देश के अल्प विकसित क्षेत्रों में विकासात्मक कार्यों में बाधा उत्पन्न करते हैं और लोगों को सरकार के प्रति भड़काने की कोशिश कर उनके हमदर्द बनने का दम भरते हैं।दूसरी तरफ सिविल सोसाइटी, मीडिया, राजनीति, छात्र, सोशल एक्टिविस्ट और अदालतों में इनसे सहानुभूति रखने वाले समर्थक मौजूद हैं जो मानवाधिकार कार्यकर्ता के छद्मवेश में कार्य करते हैं।इन्हें नक्सलवादियों के शिकार लोगों के मानवाधिकारों की चिंता नहीं होती है।इनका काम है नक्सलवादी हत्यारों के मानवाधिकारों की चिंता करना, सिविल सोसाइटी में इनके लिए सहानुभूति और समर्थन जुटाना।

भारत की शिक्षा प्रणाली प्राचीन काल मे इतनी व्यवहारिक,रचनात्मक और आध्यात्मिक थी की, विदेशी लोग भी शिक्षा प्राप्त करने के लिए यहां आते थे। इसी शिक्षा ने दुनिया को बदलने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।मुस्लिम शासकों के आक्रमणों तथा उनके वर्चस्वस्थापित होने के फलस्वरूप पूरे देश में प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का हास होने लगा एवं मुस्लिम शिक्षा का बोल बाला हो गया।मुगलों के पतन के बाद भारत में ब्रिटिश शासकों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया और इसी के साथ यहाँ आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत हुई।मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो भारत कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से भारतीय लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे,मैकाले की 179 साल पहले की गयी उसकी भविष्यवाणी वर्तमान में सही साबित हो रही है।
जब भारत आजाद हुआ, तब हमारे स्वतंत्रता सेनानी का ध्यान सबसे पहले अंग्रेज़ो की आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर गया।क्योकि अंग्रेज़ो की आधुनिक शिक्षा प्रणाली हमारे देश के लिए अनुकूल नहीं थी। सुधारों के दृष्टिकोण से समय – समय पर कई शिक्षा आयोगों बने एवं उनके सुझावों के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था में सुधार एवं परिवर्तन किये गये।
लेकिन मूल ढांचे में विशेष परिवर्तन नहीं हो पाया और शिक्षा का सही उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया।आज भी हमारी शिक्षा उन्हें विविध विषयों का सैद्धान्तिक ज्ञान तो देती है, जिससे हम नौकरी करने तक ही सीमित हो गए है।ये शिक्षा किसी प्रकार से स्वावलम्बी नहीं बना पाती है। जिसके कारण हम आज भी मानसिक तौर पर गुलाम ही बने हुए है जो हमारे युवायों को राष्ट्रभक्त नही बना सकती।इसीलिए तो पुर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय अब्दुल कलाम जी ने कहा था की, भारतीय शिक्षा प्रणाली को पूर्ण रूप से सुधार करने की आवश्यकता है । लेकिन हम ने आज तक इसमे कोई बदलाव नहीं किया। जबकि विश्व के कई विकसित देश अपने स्कूल मे पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम को हर 2 साल मे बदल देते हे । परंतु भारत मे बदलाव ना करने की वजह से हमारा पाठ्यक्रम बहुत पुराना हो चुका।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन वामपंथी या साम्यवादी जो देश के अंदर सिर्फ चीन और रूस के एजेंट की तरह कार्य कर देश की जड़ों को कमजोर करते है।इन्होंने भी अंग्रेजो की नीति अपनाकर देश की शिक्षा व्यवस्था पर अपना अधिकार किया और भारतीय इतिहास लेखन में गलत तथ्य पेश कर भारत के स्वर्णिम इतिहास को खत्म कर मुस्लिम लुटेरों और अंग्रेजो का गुणगान किया। जिसका मूल उद्देश्य लोगों को गलत इतिहास पढ़ा कर देशवासियो में हीन भावना भर देश की मानसिकता को कमजोर करना ताकि चीन और रूस जैसे देश भारत पर अप्रत्यक्ष रूप से शासन कर सकें, यह कभी भी देश के उत्थान की बात नहीं कर सकते है, नक्सलवाद का जनक ही वामपंथ विचारधारा से हैं।जबतक भारत में वामपंथ खत्म नहीं होगा तब तक नक्सलवाद और आतंकवाद से हम निजात नहीं पा सकते हैं

क्रमशः अगले भाग मे

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