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पेयजल योजनाओं के नाम पर बीते कुछ दशकों में पानी में बहा सरकारी धन

by Shrinews24
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पेयजल योजनाओं के नाम पर बीते कुछ दशकों में पानी में बहा सरकारी धन

मुख्यालय में ही सैकड़ों की तादात में खराब पड़े हैंडपंप बने शोपीस

राहुल कुमार गुप्ता
मनोज कुमार
उरई जालौन

उरई बीते कुछ दशकों के दौरान जिस तरह से पेयजल योजनाओं के नाम पर सरकारी धन का व्यय किया गया उसके सापेक्ष उनकी सार्थकता कितनी क्या मिल पाई इसका जीता जागता प्रमाण तो मुख्यालय में ही सैकड़ों की तादात में खराब पड़े सरकारी इंडिया मार्का हैंडपंपों को देखकर मिल जाती है।
बीते कुछ दशकों के दौरान केंद्र और राज्य सरकार द्वारा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को पेयजल की उपलब्धता कराने के उद्देश्य व्यापक स्तर पर सरकारी हैंड पंप लगवाए गए एक स्थिति यह थी कि इन हैंडपंपों को स्थापित कराए जाने को लेकर ग्रामीण स्तर के जनप्रतिनिधियों से लेकर विधायक और सांसद तक के प्रयास देखे गए जब लोग अपने समीपस्थ इन हैंडपंपों को लगवाने के लिए आतुर रहते थे उस दौरान हैंडपंपों का अपने घर के समीप लगवाना भी लोगों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा का रूप ले चुका था लेकिन बीते कुछ दशकों के दौरान ही स्थिति यह हो गई कि गिरते जलस्तर के चलते एक-एक कर हैंड पंप पानी देना बंद करने लगे और उन्हें कई बार रिबोर कराने के बाद भी कामयाबी नहीं मिल सकी मौजूदा स्थिति यह है कि 50 फ़ीसदी से अधिक हैंडपंप तो जमींदोज हो चुके हैं और जो कुछ बचे हुए भी हैं वह भी शोपीस बने हैं उन हैंडपंपों से भी एक बूंद पानी भी मिलना दुश्वार हो गया फिलहाल जो भी हो लेकिन इतना साफ है कि जिस तादात में हैंडपंपों को स्थापित कराए जाने को लेकर व्यापक मुहिम के तहत सरकारी धन व्यय किया गया उसके सापेक्ष उसकी सार्थकता इस कदर खटाई में पड़ना व्यवस्थाओं पर सवाल खड़ा कर देते हैं।

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