Home उत्तर प्रदेश लॉकडाउन में जाम छलका रहे शराब के शौकीन आंसू बहा रहे छोटे दुकानदार

लॉकडाउन में जाम छलका रहे शराब के शौकीन आंसू बहा रहे छोटे दुकानदार

by Shrinews24
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लॉकडाउन में जाम छलका रहे शराब के शौकीन आंसू बहा रहे छोटे दुकानदार

श्री न्यूज़ 24
दैनिक आदिति न्यूज़ समाचार पत्र

बांकेगंज खीरी
संवाददाता रमेश कुमार चौहान

छोटे व्यापारियों के प्रति सरकार का बेरहमी का भाव

बाँकेगंज खीरी। कोरोना महामारी के मद्देनजर प्रदेश सरकार द्वारा लागू की गई तालाबंदी को अब पखवारा बीतने को है इस दौरान आवश्यक वस्तुओं के नाम पर कुछ दुकानों को छोड़कर बड़ी दुकानों के साथ अत्यंत छोटी ठेले, खोमचे और पान वालों तक की दुकानें लगातार बंद है। अंग्रेजी के साथ देसी शराब बियर की दुकानों के ताले खुल गए हैं। दारु के प्रति सरकार की दरियादिली और गरीब दुकानदारों के प्रति बेरहमी के भाव से गांधी जी का दरिद्र नारायण आंसू बहाने मजबूर है।
जब कोई विपदा आती है तो उसका सबसे पहले शिकार बनने वाले सहज ही कमजोर वर्ग के लोग होते हैं और उसका दंश उन्हें ही झेलना होता है। प्रशासन की मार भी सबसे ज्यादा इन्हीं पर पड़ती है। संभवत इनके दुख दर्द को सहलाने का भान प्रशासनिक अधिकारियों और शासन के उच्च पदों पर आसीन लोगों को कम ही होता है। मौजूदा महामारी को काबू में करने के लिए शासन प्रशासन द्वारा लागू किए जाने वाले तालाबंदी का प्रभाव सबसे ज्यादा इसी वर्ग पर पड़ता है। वे मजदूरी करने को प्रदेश से बाहर गए श्रमिक हों अथवा छोटे-मोटे रोजगार चलाकर पेट भरने वाले दुकानदार। मौजूदा समय में बड़े दुकानदार तो खिड़की खोल कर भी प्रतिदिन हजारों और लाखों तक के व्यापार कर लेते हैं और मध्यम दर्जे के व्यापारियों में भी तालाबंदी सहने की क्षमता होती है परंतु ये अभागे नित्य कमाई करके खाने वाले, बस अपनी गुमटी, खोमचा और खोखा से होने वाली आय के सहारे ही होते हैं। इनमें नाई, मोची, पान पुड़िया, जूता चप्पल, मूँगफली, भूजा, टिक्की बताशा जैसे व्यापार से जुड़े लोग शामिल हैं। ये तालाबन्दी के दौरान एक तो अपनी दुकानें खोलने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते यदि वे कुछ देर के लिए अपनी दुकान खोल कर बैठे भी तो सबसे पहले प्रशासन की मार इन्हीं पर पड़ती है, मानो महामारी के लिए यही जिम्मेदार लोग हैं। लगता है तालाबन्दी की आदेश लागू करते समय शासन प्रशासन का इन लोगों के प्रति संवेदना का भाव आता ही नहीं है। या यूं कहें उनके विचार बिंदु में यह लोग मायने ही नहीं रखते। एक-दो दिन तक तो ये लोग किसी प्रकार से आधे पेट नमक रोटी खाकर रह भी लेते हैं परंतु सप्ताह और महीनों की सोच कर इनका कलेजा मुंह को आ जाता है। छोटे बच्चों की दशा देखकर इनके आंखों से आंसू टपक जाते हैं और इनके पास मन मसोसकर मन ही मन कुदरत को कोसने के सिवा और कोई चारा नहीं रहता है। ये शासन प्रशासन से राहत की उम्मीद कर रहे हैं किंतु प्रशासन का ध्यान इनकी मजबूरियों की ओर जाने की बजाय सरकारी खजाने को भरने के लिए शराब की दुकानें खोलने के फरमान ने इन्हें आहत किया है। एक गरीब दुकानदार कहते हैं कि इससे यही प्रकट होता है कि शासन प्रशासन की नजरों में गरीब की कोई अहमियत नहीं है। जब गतिविधियां सीमित करने की जरूरत हो तो योजनाकारों को योजना बनाते समय अपने जेहन में इन गरीब तबके व्यक्तियों का ध्यान रखना चाहिए। किसी कारण से यदि हफ्ते भर से ज्यादा दुकान बंद करना आवश्यक हो तो इन्हें एकमुश्त नगदी भुगतान सुनिश्चित करने का प्रावधान करना चाहिए ताकि गरीबों की रोटी चलती रहे और उसे भी लगे कि सरकार उसकी ही है अन्यथा बीमारी भले ही इन्हें न मारे किंतु भूख इन लोगों का गला जरूर घोट देगी।

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